Thursday, January 31, 2013
Tuesday, January 29, 2013
DUKH KA KARAN
एक सुनार था। उसकी दुकान से मिली हुई
एक लुहार की दुकान थी। सुनार जब काम
करता, उसकी दुकान से बहुत
ही धीमी आवाज होती, पर जब लुहार काम
करतातो उसकी दुकान से कानो के पर्दे
फाड़ देने वाली आवाज सुनाई पड़ती।
एक दिन सोने का एक कण छिटककर लुहार
की दुकान में आ गिरा। वहां उसकी भेंट लोहे
के एक कण के साथ हुई।
सोने के कण ने लोहे के कण से कहा, "भाई, हम
दोनों का दु:ख समान है। हम दोनों को एक
ही तरह आग में तपाया जाता है और समान
रुप से हथौड़े की चोटें सहनी पड़ती हैं। मैं
यह सब यातना चुपचाप सहन करता हूं, पर
तुम...?"
"तुम्हारा कहना सही है, लेकिन तुम पर
चोट करने वाला लोहे
का हथौड़ा तुम्हारा सगा भाई नहीं है, पर
वह मेरा सगा भाई है।" लोहे के कण ने दु:ख
भरे स्वर में उत्तर दिया। फिर कुछ रुककर
बोला, "पराये की अपेक्षा अपनों के
द्वारा गई चोट की पीड़ा अधिक असह्म
होती है।"
Sunday, January 6, 2013
"जीवन हर पल जीने, उत्साह-उमंग के साथ उसे अनुभव करने का नाम है। हर दिन का शुभारम्भ उत्साह के साथ ऐसे हो, जैसे नया जन्म हुआ हो, दिनभर, हर श्वास योगी की तरह जियो, जरा भी नकारात्मकता प्रविष्ट मत होने दो। सकारात्मक, सकारात्मक मात्र सकारात्मक। यही तुम्हारा चिंतन हो। यह चिंतन यदि वर्ष के शुभारम्भ से ही अपनाने का संकल्प ले लो तो तुम्हे सफलताओं के शीर्ष तक पहुँचने में ज्यादा विलम्ब न होगा।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य "
"Life is all about living each and every moment, and gaining experiences with zeal and joy. Every day should be welcomed like a new birth. Even moment should be lived like a Yogi (Advanced spiritual seeker), not even a single second should be wasted away in thinking negatively. Positive, positive and only positive ! This should be your only frame of mind. If you orient yourself to adopt this mindset with determination at the start of the new year, you won't remain far from the zenith of success in your life.
- Pt. Shriram Sharma Acharya"
Wednesday, November 7, 2012
राग - द्वेष
प्रत्येक
अपराधी अपने प्रति क्षमा की आशा करता है और दूसरों को दंड देने की व्यवस्था
चाहता है। यह अपने प्रति जो दूसरों से अहिंसक, निर्भय, उदार, क्षमाशील,
त्यागी, सत्यवादी और विनम्रता आदि दिव्य गुणों से पूर्ण व्यवहार की आशा
करता है, किंतु स्वयं उसी प्रकार का सद्व्यवहार दूसरों के प्रति नहीं कर
पाता। अपने प्रति मधुरता युक्त सम्मान की आशा करता है, पर दूसरों के प्रति
अपमान एवं कटुतापूर्ण असद्व्यवहार करता है तो वास्तव में भूल है। इसका
परिणाम यह होता है कि प्राणी अपने प्रति रागी और दूसरों के प्रति दोषी हो
जाता है, जो सभी दुःखों का मूल है।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य,
आत्मज्ञान और आत्मकल्याण, पृ. १५
Thursday, November 1, 2012
SADUPDESH
सदुपदेश की संगति
जब आप
सदुपदेशों की संगति में रहते हैं, तो गुप्त रूप से अच्छाई में बदलते भी
रहते हैं, यह सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया स्थूल नेत्रों से दीखती नहीं
है, किंतु इसका प्रभाव तीव्र होता रहता है। अंततः मनुष्य उन्हीं के अनुसार
बदल जाता है।
-पं. श्रीराम शर्मा आचार्य,
आत्मज्ञान और आत्मकल्याण, पृ. १३
Good Company of Sermons
When you are exposed to sermons and
good thoughts, silently, internally, you keep on changing towards
nobility and humbleness. This is a psychological process working at
micro level, not visible through physical eyes, but having a profound
influence on our life style. Ultimately the man is molded accordingly.
-Pt. Shriram Sharma Acharya,
Aatmagyaan aur Atmakalyaan
(Self-realization and Self-benefit), Pg- 13
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